उपनिषद का उद्देश्य विद्यार्थियों के हित में काम करना ,उन्हें नई दिशा देना ,उनकी समस्याओं का समाधान

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सोमवार, 16 नवंबर 2009

सुभाष चन्द्र बोस

“दिल्ली चलो” और “तुम मुझे खून दो मै तुम्हे आजादी दूँगा.. खून भी एक दो बुंद नहीं इतना कि खून का एक महासागर तैयार हो जाये और उसमे मै ब्रिटिश सम्राज्य को डूबो दूँ” का नारा देकर स्वाधीनता संग्राम मे नई जान फूँकने वाले सुभाष चन्द्र बोस का जन्म ख्याति प्राप्त समृद्धशाली और आदालत मे शीर्ष स्थान वाले पिता जानकीनाथ बसु तथा माता प्रभावती के घर मे 23 जनवरी सन 1897 मे हुआ था। 1902 मे अपने अन्य भाई बहनो की तरह सुभाष चन्द्र बोस जी की पढाई बैप्टिस्ट मिशन स्कूल से शुरू हुई। सुभाष 1909 मे रॉवेंशॉ मिशनरी स्कूल मे आकर सुभाष अपने शिक्षक बेनीमाधव दास से प्रभावित हुए । बाद में इनकी दाखिला प्रेसीडेंसी कालेज मे हो गया जहा उन्होने दर्शन शास्त्र मे बी.ए. करने की ठान ली। सब ठीक चलते हुए जनवरी 1916 मे हुए ‘ओटेन काण्ड’ ने इनकी जीवन मे महत्वपूर्ण बदलाव किया। ओटेन नामक शिक्षक ने कुछ छात्रो को पीट दिया था विरोध स्वरूप छात्रो ने भी उन्हे पीट दिया। कक्षा प्रतिनिधि होने के कारण सुभाष जी नें विरोध स्वरूप हडताल करवा दी, इसपर सरकार ने कॉलेज ही बंद कर दिया। मार्च 1916 से जुलाई 1917 तक सुभाष कटक मे रहे, बाद में पिता और भाई के प्रयासों से जुलाई 1917 को उन्होंने स्कॉटिस चर्च कॉलेज मे बी.ए. तृतीय वर्ष मे दाखिला लिया।
सुभाष नें 1919 मे प्रथम श्रेणी मे बी.ए. उत्तीर्ण किया फिर वे लंदन चले गये और कैम्ब्रिज मे प्रवेश लिया। भारतीय सिविल सेवा की परिक्षा दे कर 22 सितम्बर 1920 को वे चौथे स्थान से चयनित हुए। लेकिन जिस परीक्षा में वे उत्तीर्ण हुए थे उसमें वे केवल पिता की आज्ञा से बैठे थे और उन्हे केवल अपनी काबीलियत सिद्ध करने की ललक भर थी। उखे पराधीन देश आवाज दे रहा था जिसे वे अनसुना न कर सके। 22 सितम्बर 1920 को ही अपने भाई शरतचन्द्र को उन्होने पत्र लिखा कि आई.सी.एस की परीक्षा पास कर क्या ठोस उपलब्धि हुई? इस जीवन का अथ और इति क्या केवल सर्विस है? सुभाष की कश्मकश जारी थी। पुन: 26 जनवरी 1921 मे उन्होंने अपने भाई को लिखा कि या तो मैं इस रद्दी सर्विस को छोड कर देश कल्याण के लिए स्वंय को अर्पित कर दू या अपने सारे महत्वकाक्षा और आदर्शो को अलविदा कह दूँ। 23 फरवरी को उन्होंने पुन: लिखा कि देश मे इतना आन्दोलन हो रहा है पर किसी सिविल सेवा आफिसर ने इसमे भाग लेने के लिए पद त्याग नही किया। 16 जनवरी 1921 को देशबंधु चितरंजन दास को सुभाष नें लिखा कि इनका इरादा आई.सी.एस. से त्यागपत्र देने का है। 22 अप्रैल 1921 को आखिरकार आई.सी.एस पद से त्यागपत्र देकर वे देश के लिये अपनी भावनाओं को समर्पित हो गये।
16 जुलाई 1921 को सुभाष बम्बई पहुच कर महात्मा गाँधी से मिले। सुभाष को गांधी जी की क्रियात्मक योजना द्वारा शत्रु पक्ष को सुधारने की कामना करना अपने को धोखा देना प्रतीत हुआ और यही से दोनो अलग अलग रास्ते पर चलने और एक लक्ष्य प्राप्त करने को अग्रसर हुए और वो था “भारत की स्वतंत्रता”। गाधी जी ने इन्हे चितरंजन दास से मिलने की सलाह दी जिन्होने इन्हे काग्रेस का सदस्य बनाया और उन्हे बंगाल मे आदोलन जारी रखने का भार सौप दिया। इसपर स्टेट्समैन समाचार पत्र ने टिप्पणी दी “कांग्रेस को एक योग्य व्यक्ति मिल गया और सरकार ने एक लायक अफसर गंवा दिया।“ 10 दिसम्बर 1921 को गैर कानूनी परेड के जुर्म मे सुभाष को गिरफ्तार कर लिया गया। 7 फरवरी 1922 मे छ: महीनों की सजा सुनाने पर बोस ने मैजिस्ट्रेट से हँस कर कहा – “सजा केवल 6 महीने! मैने क्या चूजे चुराये है” यह उनकी पहली कैद थी। 4 फरवरी 1922 के चौरी चौरा कांड के बाद जब गाँधी जी ने असहयोग आंदोलन निलम्बित कर दिया तो राष्टवादियो मे फूट पड गयी तथा सुभाष के मन मे गाँधीवादी नीति पर अब तक पूरी तरह निर्भर रहने की रणनीति पर प्रश्न चिंह लग गया।
दिसम्बर 1922 को कांग्रेस की आपसी कलह के कारण चितरंजन दास, मोतिलाल नेहरू तथा सुभाष ने स्वराज पार्टी का गठन 1 जनवरी 1923 को किया। फिर सुभाष ने अखिल बंगाल युवा लीग की स्थापना की। 1818 के अधिनियम III के अंतर्गत बोस को गिरफ्तार कर 25 जनवरी 1925 को मांडले जेल, वर्मा भेजा गया जहाँ वे वर्मी राजनीतिक, गुरिल्ला युद्ध, विदेशी सरकार के विरोध आदि के आलावा वर्मा और भारत संस्कृति एकता से परिचित हुए। वहाँ ब्रॉंन्कों निमोनिया के वजह से उन्हे इन्सेन जेल मे भेज दिया गया पर हालत न सुधरने की वजह से इन्हे सरकार नें अपने खर्चे पर स्विटजर्लैड भेजना चाहा तो इन्होने मना कर दि या। पुन: 16 मई 1927 मे अलमोडा जेल के रास्ते से इन्हे रिहा कर दिया गया।
3 फरवरी 1928 को साइमन आयोग के पहुचने पर सारे देश मे हडताले व बॉयकॉट हुआ जिसके विरोध प्रर्दशन मे लाला लाजपत राय की मृत्यु हो गई। 30 मार्च 1929 मे उन्होने रंगपूर राजनीतिक कॉफ्रेस मे कहा “यह तैयारी का वर्ष है यदि इमानदारी से काम करोगे तो अगले वर्ष “सविनय अवज्ञा आन्दोलन” शुरू कर सकते है।“ 1 दिसम्बर 1928 मे कलकता काग्रेस अधिवेशन मे गाँधी व बोस के विचार, चिंतन तथा कार्यप्रणाली के प्रभेद खुलकर सामने आये। बोस ने सैन्य प्रशिक्षित वालिंयंटरो का एक दस्ता तैयार किया और उनके अधिवेशन मे वे जनरल कमाडिग आफिसर की हैसियत से युनिफार्म से सज्जित थे। बोस महिला वर्ग के प्रति भी जागरूक थे इसलिए 1921 मे उन्होनें नारियो को राष्टीय सेवा प्रशिक्षण देने के लिए नारी कर्म मंदिर शुरू किया गया था जो बाद मे बंद हो गया। राजनीतिक हल्फों मे गाँधी जी और बोस के विचारो के टकराव की वजह से 31 दिसंबर 1929 को बोस तथा पूरे वामपंथी वर्ग को काग्रेस से हटा दिया गया। पुन: 2 जनवरी 1930 को बोस नें जंगी राजनीतिक प्रोग्राम हेतु कांग्रेस डेमोक्रेटिव पार्टी का गठन किया। 23 जनवरी 1930 को पुन: बोस गिरफ्तार हो गये। अप्रैल 1930 मे कुछ कैदियों मे झगडा हो गया जिसमे जेल अधिकारियो ने कैदियो पर हमला बोल दिया जिसमे बोस भी थे। इन्हे इतनी मार पडी कि वे 1 घंटे के लिए बेहोश हो गये तथा इनकी मृत्यु की अफवाह फैल गयी, जिससे जनता ने जेल के बाहर भीड लगा दी।
1931 मे बोस “नौजवान भारत सभा” के अध्यक्ष चुने गये जिसमे करांची काग्रेस अधिवेशन के दौरान खुलकर गाँधी नीति का विरोध तथा “गाँधी इरविन पैक्ट” जी निन्दा की गई। 27 मार्च 1931 को बोस ने कहा “ मै भारत मे समाजवादी गणतंत्र चाहता हूँ”। 1 जनवरी 1932 के सविनय अवज्ञा आन्दोलन शुरू होते ही सभी काग्रेसी नेताओं के साथ बोस भी जेल मे बंद कर दिये गये तथा जेल मे लगातार गिरती हुई सेहत की वजह से 23 फरवरी 1933 मे एस.एस. गैज जहाज से उन्हे यूरोप भेज दिया गया। 8 मार्च 1933 को बोस वियना (स्विटजरलैड) के डॉ फर्थ के सैनिटोरियम मे दाखिल हुए जहाँ भारतीय विधान मंडल के भूतपूर्व अध्यक्ष विठ्ठल भाई पटेल से मिले तथा सक्रिय क्रांति के बारे मे जाना। बोस 23 फरवरी 1933 से अप्रैल 1936 तक युरोप मे रहकर जो सीखा वह 1934 के एक आलेख मे लिखा “ भारत मे हमे एक ऐसी पार्टी की जरूरत है जो सिर्फ भारत की आजादी के लिये ही प्रयत्नशील न हो, बल्कि संविधान भी बनाये, आजाद होने पर राष्ट्रीय पुनरचना की योजना क्रियांवित भी करे”। नवम्बर 1934 मे बोस का “द इंडियन स्ट्रगल” प्रकाशित हुआ। इसी समय पिताजी के बीमार होने की सूचना पर जब वापस भारत आए तो उन्हे नजरबन्द कर दिया गया।
8 जनवरी 1938 मे वे ब्रिटेन गये जहाँ कई अंतर्राष्ट्रीय नेताओं से मिले, कई सम्मान और स्वागत भोज भी दिए गये। 29 जनवरी 1939 के त्रिपुरी अधिवेशन के पश्चात बोस ने काँग्रेस अधयक्ष पद से त्यागपत्र देकर बिदेश जाकर भारत की स्वतंत्रता के लिए सशस्त्र संघर्षकरने का मन बना लिया। 1 सितम्बर 1939 को जब जर्मनी ने पोलैड पर आक्रमण कर दिया तब नेताजी ने “पंजाब कीर्ति किसान सभा” के सदस्यों के माध्यम से रूस जाना चाहा जिसकी भनक अंग्रेजी सरकार को लग गयी। शीघ्र ही वे बंदी बना लिये गये पर पुन: स्वास्थ बिगडने की वजह से 5 दिसम्बर 1940 को उन्हें घर मे नजरबंद कर दिया गया। वे वहाँ से भागने के लिये योजना बनाने लगे तथा लोगो से मिलना जुलना छोड दिया और दाढी बढाने लगे। 16 जनवरी 1941 को अपने भतीजे शिशिर बोस को योजना बताई और उसे कलकता से गोमो कार से पहुचाने के लिए बोला। 17 जनवरी 1941 को जब घर के सदस्य सो गये तो रात के 11 बजे शिशिर ने घर के पिछले दरवाजे पर कार लगाई। नेताजी जियाउद्दीन पठान के वेश मे उतरे और गुपचुप गोमो पहुचे जहा से नेताजी ने दिल्ली कालका डाक गाडी पकडी। गोमो से दिल्ली वे प्रथम श्रेणी मे यात्रा की और दिल्ली से फ्रंटियर मेल पकड 19 जनवरी 1941 को पेशावर छावनी पहुचे और तांगा से ताजमहल होटल पहुच वहाँ जियाउद्दीन नाम से कमरा लिया। इनके पेशावर पहुचने से पहले भगतराम तलवार, अकबर शाह, मियो मुहम्म्द शाह और अबदुल मजीद खान ने काबुल तक की सुरक्षित यात्रा की रूप रेखा बनाई। 22 जनवरी 1941 को पेशावर से कार से गाइड के साथ काबुल के लिए निकले। गाइड को रास्ते मे छोड वे जनवरी 1941 को काबुल पहुचे। पश्तो भाषा नही जानने की वजह से नेताजी ने गूँगे बहरे का नाटक किया। वे कमीज सलवार, पिशोरी चप्पल, चमडे की जैकेट, कुला और लूँगी की पग़डीमे अपने गौर वर्ण और सुंदर चेहरे से पूरे पठान लगते थे। 27 जनवरी 1941 को 11 बजे काबुल पहुच एक सराय मे कमरा किराए पर लिया। 2 फरवरी 1941 को जर्मन दूतावास के अन्दर जाकर एक अधिकारी से बात की जो इन्हे शीघ्रातिशीघ्र जर्मनी भेजने का वचन दिया। इसी बीच काबुल पुलिस का एक सिपाही इनके पीछे पडा जिससे पीछा छुडा उन्होंने एक जानकार उतमचंद मलहोत्रा के यहाँ शरण ली। दोनो उनके घर मे रहते हुए इटालियन और जर्मन दूतावास से सम्पर्क मे रहे। इटालियन दूतावास ने उनका पासपोर्ट ओरनाल्डो मोज़ाटा नाम से बनाया। आखिर 17 मार्च 1941 मे समाचार मिला कि इटले और जर्मनी से उन्हें लेने तीन आदमी आए है। 18 मर्च 1941 को काबुल से सुबह 9 बजे 2 जर्मन और 1 इटालियन की कार से रूस की सीमा के लिए रवाना हो गये। रात मुहम्मद खुमारी मे गुजार 19 जनवरी को समरकंद पहुचे। वहाँ से 20 मार्च 1941 को मास्को के लिए रवाना हुए और 27 मार्च 1941 मास्को पहुचे जहा से 28 मार्च 1941 को विमान द्वारा बर्लिन पहुचे जहाँ उनका भव्य स्वागत हुआ।
28 मार्च 1941 से 8 फरवरी 1943 तक युरोप मे रहे और इंडियन लीजन को गठित किया। युद्ध की दौरान उनसे कहा गया कि दक्षिण पूर्व एशिया पहुच सिंगापूर में आजाद हिंद फौज का नेतृत्व संभाले। 1-16 मार्च 1943 तक एक जोखिम भरी समुद्री यात्रा कर 2 जुलाई 1943 को नेताजी सिंगापुर पहुचे और आजाद हिंद फैज के गठन मे जुट गये। अंग्रेजो के नेतृत्व मे हिन्दुस्तानी फौज 19 फरवरी 1942 को जापान के फौज के सामने आत्मसमर्पण कर अपना मनोबल खो चूकी थी। नेताजी ने उस हारी हुई सेना को एक क्रांतिकारी और बलिदानी सेना मे बदल दिया। बोस ने सबसे पहले आजाद हिंद फौज का पुनर्गठन कर इसकी शाखाए दक्षिण पूर्व एशिया मे खोली और 30 लाख भारतीय मूल के लोगों को एक सूत्र मे बाँधा। एक अस्थायी आजाद हिंद सरकार का गठन 21 अक्टूबर 1943 को किया गया जिसे 9 राष्ट्रो से मान्यता प्राप्त हुई।
22 अक्टूबर 1943 को रानी झासी रेजिमेंट का गठन कर 23 अक्टूबर 1943 को इंगलैड और अमेरिका के बिरूद्ध युद्ध की घोषणा की गई। बाद मे नेताजी ने जापान, चीन, फिलिपिंस, वियतनाम आदि की यात्राए की। 19 दिसम्बर 1943 को आजाद हिन्द सरकार के मंत्रीमंडल की बैठक मे अनेक महत्वपूर्ण निर्णय लिए गये जैसे सैनिको की पेंशन, वीरता के लिए पदक, राष्ट्रीय गीत कदम कदम मिलाए जा..., हिन्दुस्तानी राष्ट्रीय भाषा, राष्ट्रीय उदघोष जय हिन्द, राषट्रीय तिरंगा ध्वज( जिसपर छलांग लगाता हुआ चीता चिन्हित था), मुद्रा डाक टिकट और राष्ट्रीय नारा” दिल्ली चलो” इत्यादि। फिर आजाद हिन्द का कार्यालय जापान से अंडमान व निकोबार लाया गया तथा जनरल लोकनायक को राज्यपाल नियुक्त किया गया। रंगून मे आजाद हिंद बैक की स्थापना की घोषणा की गई।
4 फरवरी 1944 को अराकन युद्ध मे फौज ने सफलता प्राप्त की और कर्नल बिसरा और मेहर दास को “सरदारे जंग” पदक से सम्मानित किया गया। फरवरी और मार्च मे फौज ने अंग्रेजो के मेढ़्क पिकिट पर कब्जा कर लिया पुन: आजाद ब्रिग्रेड इम्फाल और कोहिमा के रास्ते आगे बढी जहाँ अंगेजो को आश्रय लेने पर विवश किया। मई 1944 को कोहिमा का आजाद का घेरा मजबूत किया गया पर मौसम खराब हो जाने की वजह से और खाद्य सामग्री और गोले बारूद की कमी से जवान मरने लगे तो विवश होकर फौज को पीछे हटने आ आदेश दिया गया। जिसमे बहुत से सैनिक वीरगति को प्राप्त हुए। पुन: जापान की नई टुकडी और आजाद हिंन्द फौज के नेहरू ब्रिग्रेड ने मध्य वर्मा मे अंग्रेजो की सेना को बहुत क्षति पहुचाई। अप्रेल 1945 की अंग्रेजी फौज आर्मी जनरल विलियम स्मिथ की कमान मे भारी हवाई हमले और भारी गोलीबारी के बीच इरावती नदी पार कर गई। अंतत: अप्रेल 1945 मे आजाद हिंद फौज हार गई।
नेताजी 24 अप्रैल 1945 को रंगून से सिंगापूर की ओर रवाना हुए जिसमे उनके साथ बाकी आजाद हिंद फौज के जवान और रानी झासी रेजिमेंट की वीरांगनाए थी। यद्यपि इम्फाल और कोहिमा मे आजाद हिन्द फौज की हार हुई पर जवानो ने प्राण नियोछावर करने मे अदभूत वीरता दिखाई और अंग्रेजी सेना के दिल पर अमिट छाप छोडी। इसी बीच 18 अगस्त 1945 को जापान ने वायुयान से बोस और उसके मंत्रीमंडल को स्पेशल जहाज से मनचुरिया पहुचाना था। बोस की योजना थी कि वह रूस पहुच स्वयं को रूसी सेना के हवाले कर रूसी सहायता से पुन: प्रयास करना चाहते थे। 17 अगस्त 1945 को वायुयान मे सीमित स्थान के वजह से बोस के साथ केवल हवीवुर्रहमान गये जो 18 अगस्त 1945 को तेइपई पहुचा पुन: जब 2 बजे दिन मे विमान तेइपई से उडा तो वायुयान मे विस्फोट हुआ और वायुयान जमीन पर आ गिरा। हविवुर्रहमान को छोटी मोटी चोटे आई। ले. जनरल शिदेई तथा विमान चालक ताकिजावा की मृत्यु हो चूकी थी तथा नेताजी के सिर के बाये हिस्से मे चार इंच लम्बा गहरा घाव था। अपने अंतिम समय में उन्होने रहमान से कहा “हबीब जब वापस जाओ, मेरे देशवासियो से कहना कि मै अपने देश के लिए अंत तक लड़ा और अब अपने देश के लिए प्राण दे रहा हूँ। अब कोई शक्ति हमारे देश को गुलाम नहीं रख सकेगी। भारत बहुत शीघ्र स्वतंत्र हो जायेगा” उनके अंतिम वाक्य जल्दी ही सत्य हुए। नेताजी को जपानी डाक्टरों के भरसक प्रयासो के बावजूद नहीं बचाया जा सका और 18 अगस्त 1945 को रात 8.30 बजे उन्होंने अंतिम स्वांस ली। नेताजी सुभाष का शव दहन 20 अगस्त 1945 के तेइपई मे किया गया और इनकी अस्थिया निशिहोनगाँजी मंदिर तेइपई मे रख दी गई। अंग्रेज सरकार को इनकी मौत का विश्वास नही हुआ क्योकि नेताजी कई बार फरार हो चुके थे, इसलिए आज भी देशवासी इनके मौत पर बिश्वास न कर इनके लौटने का इंतजार कर रहे है। एक सच यह भी है कि नेता जी सुभाष चंद्र बोस अमर हैं।

शुक्रवार, 30 अक्टूबर 2009

विद्यापति

विद्यापति भारतीय साहित्य की भक्ति परंपरा के प्रमुख स्तंभों मे से एक और मैथिली के सर्वोपरि कवि के रूप में जाने जाते हैं। इनके काव्यों में मध्यकालीन मैथिली भाषा के स्वरुप का दर्शन किया जा सकता है। इन्हें वैष्णव और शैव भक्ति के सेतु के रुप में भी स्वीकार किया गया है। मिथिला के लोगों को 'देसिल बयना सब जन मिट्ठा' का सूत्र दे कर इन्होंने उत्तरी-बिहार में लोकभाषा की जनचेतना को जीवित करने का महती प्रयास किया है।
मिथिलांचल के लोकव्यवहार में प्रयोग किये जानेवाले गीतों में आज भी विद्यापति की श्रृंगार और भक्ति रस में पगी रचनायें जीवित हैं । पदावली और कीर्तिलता इनकी अमर रचनायें हैं।
प्रमुख रचनायें
महाकवि विद्यापति संस्कृत, अबहट्ठ, मैथिली आदि अनेक भाषाओं के प्रकाण्ड पंडित थे। शास्र और लोक दोनों ही संसाराह में उनका असाधारण अधिकार था। कर्मकाण्ड हो या धर्म, दर्शन हो या न्याय, सौन्दर्य शास्र हो या भक्ति रचना, विरह व्यथा हो या अभिसार, राजा का कृतित्व गान हो या सामान्य जनता के लिए गया में पिण्डदान, सभी क्षेत्रों में विद्यापति अपनी कालजयी रचनाओं के बदौलत जाने जाते हैं। महाकवि ओईनवार राजवंश के अनेक राजाओं के शासनकाल में विराजमान रहकर अपने वैदुश्य एवं दूरदर्शिता सो उनका मार्गदर्शन करते रहे। जिन राजाओं ने महाकवि को अपने यहाँ सम्मान के साथ रखा उनमें प्रमुख है:
(क) देवसिंह (ख) कीर्तिसिंह (ग) शिवसिंह (घ) पद्मसिंह (च) नरसिंह (छ) धीरसिंह (ज) भैरवसिंह और (झ) चन्द्रसिंह।
इसके अलावे महाकवि को इसी राजवंश की तीन रानियों का भी सलाहकार रहने का सौभाग्य प्राप्त था। ये रानियाँ है:
(क) लखिमादेवी (देई) (ख) विश्वासदेवी और (ग) धीरमतिदेवी।

मैथिलीक आकाशमे विद्यापति एकटा एहन नक्षत्रराज भेलाह जनिका लऽ कऽ हमरालोकनि आन-आन भाषा-भाषीक समक्ष गौरवक अनुभव कऽ रहल छी । बड्गालीलोकनि हिनक कृतिसँ मुग्ध भऽ कऽ हिनका बङ्गाली बनएबाक अथक प्रयास सेहो कएलनि, मुदा ओ लोकनि सफल नहि भेलाह । महामहोपाध्याय हरप्रसाद शास्त्री, जस्टिस शारदाचरण मित्र, बाबू नगेन्द्रनाथ गुप्त आदि बङ्गाली विद्वानलोकनि मानि लेलनि जे विद्यापति बङ्गाली नहि, मिथिलावासी छलाह आ मैथिलीमे गीत लिखलनि । एहि दिशामे काज कएनिहार ग्रियर्सन साहेब निश्‍चित रुपसँ धन्यवादक पात्र छथि जे सर्वप्रथम विद्यापतिकेँ बंगाली सँ बिहारी प्रमाणित कएलनि ।
विद्यापतिक जन्म सन १३५० ई. मे मधुबनी जिलाक बिस्फी गाममे भेल छलनि । ई बैशैबारगढ़ मूलक काश्यप गोत्रीय ब्राह्मण छलाह । मुदा जहियासँ बिस्फी गाम उपार्जन कएलनि तहियासँ हिनक मूल बिशैबार बिस्फी भऽ गेलनि । हिनक पिताक नाम गणपति ठाकुर तथा माताक नाम हासिनी देवी छलनि । कहल जाइत अछि जे कपिलेश्‍वर महादेवक आराधना कऽ गणपति ठाकुर एहन पुत्ररत्‍न प्राप्त कएने छलाह । मिथिलाक प्रसिद्ध विद्वान हरि मिश्र सँ ई शिक्षा ग्रहण कएने छलाह । पक्षधर मिश्र हिनक सहपाठी छलथिन ।
ई एकटा मनोवैज्ञानिक तथ्य अछि जे जखन केओ समाजमे उच्च पदपर आसीन भऽ जाइत छथि तँ हुनक विद्वेषी हुनक व्यक्तित्वकेँ छोट करबाक हेतु नाना प्रकारक बात सभ करऽ लगैत अछि । एहन विद्वेषीमे एकटा केशव मिश्र सेहो छलाह । ओ अपन द्वैतपरिविष्ट नामक धर्मशास्त्र-ग्रन्थमे ‘ये केञ्चन्र भागवतः ग्राम याचकः नर्तकाः’ कहि कऽ विद्यापतिक उपहास कएने छथि । अर्थात ओ राजदरबारमे भागवतक वाचन करैत छलाह तेँ भगवतिया भेलाह, ओ राजा शिवसिंहसँ बिस्फी ग्राम उपहारस्वरुप पओने छलाह तेँ ग्राम-याचक भेलाह आ देशी भाषामे गीत बनौलनि तें नटुआ भेलाह । मुदा अपसोचक बात ई अछि जे केशव मिश्र आइ जीवित नहि छथि । जँ ओ आइ जीवित रहितथि तँ विद्यापतिक लोकप्रियता देखिकऽ हुनक माथ लाजसँ झुकि जइतनि ।
विद्यापतिक पिता गणपति ठाकुर राजा गणेश्‍वरक दरबारमे मन्त्री छलाह । तें ओ नेत्रहिसँ अपन पिताक सङ्ग गणेश्‍वरक दरबारमे जाइत-अबैत छलाह । गणेश्‍वरक बाद कीर्तिसिंह राजा भेलाह । अतः ओ हिनका दरबारमे जाए-आबऽ लगलाह । विद्यापति एहि कीर्तिसिंहक नामपर अपन पहिल पुस्तक कीर्तिलता लिखलनि । एकर भाषा अपभ्रंश (संस्कृत-प्राकृत मिश्रित मैथिली) अछि, जकरा ओ अवहट्ट कहने छथि । एहि भाषा पर हुनका गर्व सेहो छलनि । एतदर्थ देखल जा सकैत अछि ओहि पुस्तकक पहिल पल्लबक ई पांति-
देसिल बयना सब जन मिट्ठा ।
तें तैसन जम्पओ अवहट्ठा ॥
अर्थात देशी भाषा (अपन भाषा) सभकेँ मीठ लगैत छैक । तें हम एहि भाषामे एकर रचना कएल । हुनक मोनमे इहो शङ्का छलनि जे ज्योतिरीश्‍वर जकाँ हमरो एहि भाषाकेँ देखिकऽ संस्कृतक पंडित हँसताह । कारण, ओहि समयमे न्याय आ मीमांसाक अध्ययन तथा टिप्पणी लिखब पण्डितलोकनिक प्रिय वस्तु छलनि । मुदा विधापति एहि मार्ग कें बदलि कऽ ज्योतिरीश्‍वर जकाँ अपन नव मार्ग बनेलनि । ई नव मार्ग विषय-वस्तु तथा भाषा दुनू स्तर पर छल । तें हुनक भाषाक संबंधमे कहल जाईछ :-
बाल चन्द विज्जावइ भाषा ।
दुहु नहि लग्गै दुज्जन हासा ॥
श्री परमेश्‍वर हर सिर सोहई ।
ई णिच्चई णाअर मन मोहइ ॥
अर्थात्‌ बालचन्द्र तथा मैथिली भाषा देखि कऽ दुर्जन लोक कें हँसी नहि लगतनि । कारण बाल चन्द्रमा शिवक मस्तक पर शोभित छनि आ ई भाषा बुझनिहार लोकक मन मोहबला अछि । एहिठाम हमरा सभ के इ नहि बिसरबाक चाही जे विद्यापति एहि भाषा कें वाल चन्द्र सदृश थाढ़ कएने छथि । विद्यापति अपन एहि भाषा मे कीर्तिपताका आ कीर्तिलता नामक ग्रंथ लिखलनि । एहि दुनू ग्रंथक अलावा ओ संस्कृत मे भू-परिक्रमा, पुरुष परीक्षा, लिखनावली, शैव सर्वस्वसार, गंगावाक्यावली, दानवाक्ययावली, दुर्गा भक्‍ति तरंगिनी, विभाग सार, न्याय पत्तल, ज्योति प्रदर्पण, वर्षकृत्य, गोरक्ष विजय (नाटक ), मणिमंजरी (नाटक) आदि ग्रंथक रचना कएलनि । जतऽ भू परिक्रमा मे विद्यापति मुख्य तीर्थ सभक वर्णन कएने छथि ओतऽ लिखनावली मे पत्र लेखन शैलीक विवरण अछि । राजा शिवसिंहक आदेश पर लिखल गेल पुरूष परीक्षा मे ललित कथाक रूप मे धार्मिक तथा राजनीतिक विषयक वर्णन अछि । ठीक एहिना दुर्गा भक्ति तरंगिनी मे दुर्गाक गहना तथा दुर्गा पूजाक विधि संबंधी बात नरसिंह देवक आदेश पर लिखल गेल । शैव सर्वस्वसार मे भव सिंह सँ लऽ कऽ विश्‍वास देवी धरिक राजाक कीर्ति कथाक संगहि शिवपूजा विधिक उल्लेख अछि ।
एहि तरहें देखल जाय तँ ओ मात्र गीतकारे नहि, अपितु यात्रा वृतांत लेखक, कथाकार, पत्र लेखक, निबन्धकार आदि छलाह । मुदा सभ सँ बेसी हुनका ख्याति भेटलनि गीतकारक रूप मे । एहि रूप मे ओ अमर भऽ गेलाह । हुनक गीतक संबंध मे ग्रियर्सन कहने छथि - ’भलेहि हिन्दू धर्मक सुर्य अस्त भऽ जाय, ओहन समय आबि जाए जखन कृष्णक स्तुतिक लेल लोक मे विश्‍वास आ श्रद्धा नहि एहि जाईक जे हमरा लोकनिक अस्तित्वक औषधि अछि, तथापि विद्यापति गीतक प्रति जे अनुराग अछि, ओ कहियो कम नहि होयत जाहि मे ओ राधा कृष्णक चर्च कएने छथि ।
विद्यापतिक जतेक गीतसभ अछि ओहिमे अधिकांश गीत सभ श्रृंगार-रस प्रधान अछि, जाहिमे संस्कृत शास्त्रक अनुसार वय: सन्धि, नखशिख, विरह, अभिसार, सद्य: स्नाता, कौतुक, मान, मिलन आदिक वर्णन बहुत मनमोहक ढ़ग सँ कएल गेल अछि । उदाहरणक रूप मे नख शिख वर्णनक एकटा गीत देखल जा सकैछ -
माधव की कहब सुन्दरि रूपे ।
कतन जतने विहि आनि समारल, देखल नयन सरूपे ॥
पल्लवराज चरण -युग सोभित, गति गजराजक भाने ।
कनक कदलिपर सिंह समारल, तापर मेरू समाने ।
मेरू उपर दुई कमल फ़ुलाएल, नाल बिना रूचि पाई ।
मनिमय हार धार बहु सुरसरि, तेँ नहि कमल सुखाई ॥
अधर बिम्बसन, दसन दाडिम बिजु , रवि ससि उगथि पासे ।
राहु दूर बसु निअरे न आवथि तेँ नहि करथि गरासे ॥
सारंग उपर उगल दस सारंग, केलि करथि मधुपाने ॥
भन‍ई विद्यापति सिन बर जौबति, एहि जगत नहि आने ।
राजा सिवसिंह रुपनाराएन, लखिमा देह प्रतिभाने ॥
विद्यापतिक उपर्युक्त गीत समस्त भारतीय भाषा-संसार मे अद्वितीय मानल गेल अछि । एहि गीतपर मोहित भऽ कऽ महाकवि सूर तथा कवि चन्द सेहो एहि प्रकारक गीत लिखबाक चेष्टा कएलनि, मुदा जे उचाँइ विद्यापति अपना गीतमे दऽ सकलाह ओ उँचाइ हिनाकालोनिसँ सम्भव नहि भऽ सकल ।
विद्यापति मात्र एकटा साहित्यिके व्यक्‍ति नहि, अपितु ओ एकटा सफ़ल कूटनीतिज्ञ सेहो छलाह । एकर पुष्टि एहि तथ्यसँ होइत अछि जे जखन यवन सेना हुनक प्रिय राजा शिवसिंह केँ पकड़िकऽ दिल्ली लऽ गेलनि तँ ओ अपन कुटनीतिक प्रयाससँ हुनका छोड़ाकऽ दिल्ली सँ पुन: मिथिला अनलनि । एहि क्रम मे दिल्लीक बादशाह केँ जखन अपन परिचय देलथिन तँ ओ कहलकनि जे तोँ अपनाकेँ कवि कहैत छह तँ अपन कौशल देखाबह । एहिपर विद्यापति कहलथिन जे हम अदृश्य चीजक वर्णन कऽ सकैत छी । तखन हुनक आँखिपर पट्टी बान्हि देल गेलनि ।
कोनो- कोनो ठाम उल्लेख अछि जे सन्नुकमे बन्न कऽ कऽ हुनका इनारमे धऽ देल गेलनि आ कतेको ठाम इहो उल्लेख अछि जे हुनका कोठली मे बन्न कऽ देल गेलनि । मुदा ई दुनू बात विश्‍वसनीय नहि बुझना जाइछ । कारण जाहिठाम दरबार लगैत छल होएत ओहिठाम इनार रहब असंगत बुझि पड़ैत अछि । दोसर जँ विद्यापति चिचिया- चिचियाकऽ गबितथि तखनहि बादशाह तथा अन्य दरबारीलोकनिकेँ सुनऽमे अबितनि एहना स्थिति मे पट्टीए समीचीन बुझना जाइत अछि । खैर तखन एकरा बाद जे नृत्यांगना नृत्य कएलनि ओकर बोल निम्नांकित रूपेँ देलनि -
सजनि निहुरि फ़ुकू आगि ।
तोहर कमर भमर मोर देखल, मदन उठल जागि ॥
जौँ एहि सङ्कटसौ जिव बाँचत होएत लोचन मेला ॥
भन विद्यापति चाहथि जे विधि करथि से- से लीला ।
राजा शिवसिंह बन्धन मोचन तखन सुकवि जीला ॥
राजा शिवसिंह स्वच्छंद प्रकृतिक लोक रहबाक कारणे पुन: दिल्लीक बादशाहक उल्लङघन करऽ लगलाह । अत: ओ कुपित भऽ कऽ हिनकापर चढ़ाइ कऽ देलकनि । एहिबेरक लछण- करम ठीक नहि छल , तेँ शिवसिंह अपन सभसँ विश्‍वासी व्यक्ति विद्यापतिक सङ्क महारानी लोकनिकेँ राजा पुरादित्यक ओहिठाम रहलाह । ओहि राजाक विश्‍वासपात्र बनल रहलाह । ओ दोसर, कोनो आन राजाक समक्ष कोना की बर्ताव कएल जाए, तकर ज्ञान हिनका नीक जकाँ छलनि । ई दुनू बात हिनक व्यक्तित्व उल्लेखनीय पक्ष अछि
विद्यापति कतेको राजा तथा रानीक दरबार मे रहलाह । यथा- गणेश्‍वर, भवेश्‍वर, कीर्तिसिंह, देवसिंह, शिवसिंह, पद्मसिंह, विश्‍वासदेवी, रत्नसिंह तथा धीरसिंह । एहिमे गणेश्‍वरक वध कऽ भवेश्‍वर राजा भेल छलाह । कीर्तिसिंह दिल्लीक बादशाहक सहयोगसँ भवेश्‍वरक पुत्रकेँ मारि हत्याक बदला लऽ राज्य फ़िर्ता लेलनि । शिवसिंह युद्धभूमिसँ लापता भऽ गेलाह । कतेको राजासँ हुनकालोकनिक स्वाभाविक मृत्युक कारणे विद्यापतिक सङग छुटि गेलनि । एहि तरहेँ ओ गणेशवरसँ धीरसिंह धरिक घटनाकेँ देखैत- देखैत भीतरसँ टुटि गेल छलाह । तेँ अधिकांश गीतमे धैर्य रखबाक प्रेरणा देनिहार महान आशावादी कवि निराशावादी मे बदलि गेलाह । एहना स्थिति मे ओ कहि उठलाह - माधव हम परिणाम निरासा ।
यवनक आक्रमण तथा जल्दी जल्दी नेतृत्व परिवर्तनक कारणे मिथिलाक आर्थिक आ सामाजिक स्थिति सुदृढ छल से नहि कहल जा सकैत अछि । कारण, ई परिपाटी देखल गेल अछि जे जखन कोनो क्षेत्रपर यवन सेना आक्रमण करैत छल तँ ओसभ ओहि क्षेत्रके नाश कऽ दैत छल । रूपमती स्त्रीलोकनिक आत्मा ओकरासभक अत्याचार सँ कलपि उठैत छलनि । राज्यक लोकसभ त्राहिमाम त्राहिमाम करऽ लगैत छल । एहना स्थितिमे गार्हस्थ्य जीवन छिन्न भिन्न भऽ जाइत छलैक । एहि विकट परिस्थिति मे गार्हस्थ्य जीवनसँ पलायनोन्मुख समाजकेँ पुन: गार्हस्थ्य जीवन मे घुमएबाक हेतु विद्यापति एहि शिवगीतक रचना करैत देखल जाइत छथि -
बेरि-बेरि अरे सिव, मोञ तोहि बोल्यो
किरिस करिअ मन लाए ।
बिनु सरमे रर्हिअ, भिखिए पए मड्गिअ
गुन गौरब दुर जाए ॥
खटमऽ काटि हर हर बन्धबिए
तिरसिल तोड़िअ करू फ़ारे ।
बसह धुरन्धर लए हर जोतिअ
पाटिअ सुरसरि धारे ॥

एतबए नहि, विद्यापतिक समय मे मिथिला मे बहु विवाहक प्रथा छल । स्वयं राजा शिवसिंह छओटा विवाह कएने छलाह । स्त्री केँ भोगक वस्तु मानल जाइत छल । तेँ लोक बुढ़ो मे विवाह करबाक हेतु आतुर रहैत छल । एकर चित्र हमरालोकनिकेँ विद्यापतिक दोसर गीत मे भेटैत अछि -
आगे माइ , हम नहि आजु रहब एहि आड्गन ।
जञो बुढ़ होएत जमाय ॥

मिथिलाक किछु वर्ग मे ई देखल जाइत अछि जे जखन पति पत्नी मे कोनो प्रकारक झगड़ा होइत छैक तँ पत्‍नी अपन बेटा - बेटीकँ कखियाकऽ नैहर चलि दैत अछि । ई परिपाटी विद्यापतिकालीन मिथिला मे सेहो छल । एकर चित्रण हमरा लोकनिकँ विद्यापतिक निम्नांकित गीत मे भेटैत अछि _
चलली भवानी तेजिअ महेश ।
कर धए कार्तिक गोद गणेश ॥
उपर्युक्त शिवगीतकँ देखैत ई बात सरासर गलत होएत जे विद्यापति खाली रजनीए- सजनीमे लागल रहलाह । किछु समीक्षकलोकनि एहू बातकँ बिसरि जाइत छथि जे “घन घन घनन गुगुर कतऽ बाजए , हन हन कर तुअ काता" वला भैरवी वन्दना सेहो ओ लिखलनि जे वीररसकेँ साकार करैत अछि । एहि तरहें देखैत छी जे विद्यापति अपन कलमरूपी तरूआरि नीकजकाँ चारूदिस भजलनि । ईएह कारण अछि जे विद्यापतिकेँ जतेक उपाधि देल गेलनि ओतेक उपाधि संसारक कोनो कवि नहि पाबि सकलाह । आइ ई हमरालोकनिक समक्ष कविकोकिल, कविकण्ठहार, कविरञ्जन, कविशेखर, सुकवि, महाकवि, दशावधान, पञ्चानन , अभिनव जयदेव आदि उपाधिसँ जानल जाइत छथि ।
मिथिलाक ई नक्षत्र सन १४५० ई मे कैलाशवासी भऽ गेलाह । यद्यपि हिनक जन्म आ मृत्युक साल विद्वानलोकनिक बीच मतान्तरक विषय आछि, तथापि मास तिथि मे कोनो विवाद नहि अछि । कारण, एकर उल्लेख हमरालोकनिकेँ भेटि गेल अछि-
विद्यापतिक आयु अवसान ।
कार्तिक धवल त्रयोदशि जान ॥

मंगलवार, 27 अक्टूबर 2009

mithila maithili

जय मिथिला जय मैथिलि
मान्यवर;
आय हम अहाँ सबहक सामने ऐय ब्लॉग क दूर आयल छि । बहुत दिन सं सोचैत छलों जे मैथिलि में एकटा ब्लॉग के निर्माण करी जाही में मिथिला , मैथिलि आ मिथिला के खावर देल जय। त लिया हम आय सं अहाँ सभक सामने आयल छि आ हाल चाल सुनावेत छि ।